बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर होशियारपुर में आध्यात्मिक सत्संग का आयोजनगुरु के मार्गदर्शन बिना आत्म-कल्याण और जीवन में पूर्ण सफलता असंभव — साध्वी मीमांसा भारती
होशियारपुर/दलजीत अज्नोहा
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा गौतम नगर आश्रम, होशियारपुर में आयोजित साप्ताहिक सत्संग समारोह में बुद्ध पूर्णिमा के पावन पर्व की प्रासंगिकता और मानव जीवन में पूर्ण गुरु की अनिवार्यता पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी मीमांसा भारती जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि गौतम बुद्ध जी का जीवन केवल वैराग्य की गाथा नहीं, बल्कि सत्य की खोज और आंतरिक प्रकाश की प्राप्ति का जीवंत प्रमाण है। जैसे सिद्धार्थ ने महलों के सुख को त्याग कर सत्य की खोज की, वैसे ही आज का आधुनिक मानव भी भौतिक सुखों के अम्बार के बीच मानसिक अशांति और दिशाहीनता का अनुभव कर रहा है। साध्वी जी ने गौतम बुद्ध उनके गुरुओं के प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि कठोर तपस्या के बाद भी जब तक उन्हें 'तत्व ज्ञान' (ब्रह्म ज्ञान) की प्राप्ति नहीं हुई, तब तक निर्वाण का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ। ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जिस प्रकार चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है, उसी प्रकार एक शिष्य का अंतर्मन पूर्ण गुरु की कृपा और उनके द्वारा प्रदान किए गए 'ब्रह्म ज्ञान' के प्रकाश से ही आलोकित होता है। बिना आध्यात्मिक नींव के प्राप्त की गई सांसारिक सफलता अक्सर अहंकार और पतन का कारण बनती है, जबकि गुरु के मार्गदर्शन में अर्जित की गई सफलता व्यक्ति को परोपकार और वैश्विक शांति की ओर अग्रसर करती है।
साध्वी जी ने वर्तमान समाज में बढ़ती नशाखोरी, वैचारिक प्रदूषण और युवाओं में बढ़ते अवसाद जैसी गंभीर समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन सामाजिक बुराइयों का मूल कारण आंतरिक शून्यता है। जब तक मनुष्य का नाता अपनी आत्मा से नहीं जुड़ता, वह बाहरी प्रलोभनों का शिकार होता रहता है। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी आज के युग में उसी सनातन पद्धति 'ब्रह्म ज्ञान' के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग, विशेषकर युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं ताकि वे नशे और अनैतिकता के मार्ग को छोड़कर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकें। साध्वी जी ने जोर देकर कहा कि आत्म-साक्षात्कार ही वह एकमात्र वैज्ञानिक विधि है जो मस्तिष्क की तरंगों को सकारात्मकता में बदलकर समाज में शांति ला सकती है। केवल 'बाहरी बुद्ध' की पूजा पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर छिपे 'बुद्धत्व' को जगाना ही बुद्ध पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है। संस्थान द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न सामाजिक सुधार अभियानों की चर्चा करते हुए उन्होंने उपस्थित जनसमूह का आह्वान किया कि वे भी अपनी अंतरात्मा को जागृत कर एक सभ्य और संस्कारित समाज के निर्माण में सहभागी बनें।
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