होशियारपुर/दलजीत अज्नोहा
वास्तु का वास्तविक अर्थ होता है प्रकृति के अनुरूप व्यवस्था ।हम जिस भवन में निवास करते हैं उस भवन में नींव ,मुहूर्त,प्रारूप,निर्मित इकाईये,द्वार,ब्रह्म,मूषा,मर्म,तिर्यक रेखा,वंश,रज्जु दिशा,पंच तत्व,रंग,ढलान,आंतरिक साज सज्जा,बाहरी वास्तु के साथ बत्तीस बाहरी देव,तेरह आंतरिक देव आदि का अपना अलग अलग महत्व होता है ऐसा मानना है अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वास्तुविद एवं लेखक डॉ भूपेन्द्र वास्तुशास्त्री का ।उपरोक्त सभी के साथ वास्तु में एक विशेष विधान है वो है हवन एवं यज्ञ की आहुतियों का ।ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए वरदान के अनुसार वास्तु यज्ञ की आहुति से वास्तु पुरुष का आशीर्वाद तो मिलेगा ही मिलेगा उनके साथ भवन में विराजमान समस्त पेतालीस देवी देवता भी प्रसन्न होंगे और उनके आशीर्वाद से जीवन में ख़ुशहाली मिलेगी ,सुख शांति एवँ लक्ष्मी जी का स्थिर वास भी होगा ।इस बात की पुष्टि इस कहावत से चरितार्थ होती हैं “एक ही अर्चन से मिले पंच-चालीस असीस ! नींव सवरती भवन की ,तुष्ट होय जगदीश “
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